शीर्षक - जीवन उद्देश्य
कविता का दिनांक - २६.०९.११
" चलो चले सृष्टि के उस पार !
उस जीवन आधार, उस निराकार,
से पूछने क्या है जीवन का सार !
क्यों है मन में अशांति अपार ?"
" जीवन क्या कर्तव्यों का मेला है ?
या फिर रिश्तो का रेला है ?
या पंछी स्वछन्द आकाश में,
उड़ता रहे यूँ ही अकेला है ? "
" बाल्य खेल, युवा उद्यम में,
प्रौढ़ घड़ी देख बिताना है?
क्या कोई वचन सुधा नहीं जो,
जीवन का भेद बताना है ?"
" ईश वंदन ही शेष अगर तो,
रिश्तों की क्यों आसक्ति है ?
क्या रिश्तो में ही जीवन तो,
उनमे भी ये विरक्ति है !"
" या उद्यम ही है जीवन तो ,
उद्यम तो मैं करता हूँ !
पर क्या लक्ष्मी ही जीवन है ?
मैं घृणा उसी से करता हूँ !"
" गृहस्थ अगर जीता प्राणी,
तो गृहिणी मेरी देवी है !
बालक मेरे सुकुमार सुशील !
पर फिर भी प्यास अधूरी है !"
" जन- कल्याण जीवन है तो,
फिर जन क्यों जीते मरते है ?
धन वैभव एवं प्रतिष्ठा में ;
सब नर, भक्षी दिखते है !"
" हे ईश मेरे! जगदीश मेरे !
जगजीवन का उद्देश्य है क्या?
मैं भटक रहा हूँ , छपट रहा हूँ!
कुछ जीने; ऐसे न मरने के लिए !"
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