शनिवार, 28 अप्रैल 2012

Jeewan Uddeshya

शीर्षक - जीवन उद्देश्य
कविता का दिनांक - २६.०९.११

" चलो चले सृष्टि के उस पार !
उस जीवन आधार, उस निराकार,
से पूछने क्या है जीवन का सार !
क्यों है मन में अशांति अपार ?"

          " जीवन क्या कर्तव्यों का मेला है ?
            या फिर रिश्तो का रेला है ?
            या पंछी स्वछन्द आकाश में,
            उड़ता रहे यूँ ही अकेला है ? "

" बाल्य खेल,  युवा उद्यम में,
प्रौढ़ घड़ी देख बिताना है?
क्या कोई वचन सुधा नहीं जो,
जीवन का भेद बताना है ?"

          " ईश वंदन ही शेष अगर तो,
            रिश्तों की क्यों आसक्ति है ?
            क्या रिश्तो में ही जीवन तो,
            उनमे भी ये विरक्ति है !"

" या उद्यम ही है जीवन तो ,
उद्यम तो मैं करता हूँ !
पर क्या लक्ष्मी ही जीवन है ?
मैं घृणा उसी से करता हूँ !"

          " गृहस्थ अगर जीता प्राणी,
            तो गृहिणी मेरी देवी है !
            बालक मेरे सुकुमार सुशील !
            पर फिर भी प्यास अधूरी है !"

" जन- कल्याण जीवन है तो,
फिर जन क्यों जीते मरते है ?
धन वैभव एवं प्रतिष्ठा में ;
सब नर, भक्षी दिखते है !"

          " हे ईश मेरे!  जगदीश मेरे !
            जगजीवन का उद्देश्य है क्या?
            मैं भटक रहा हूँ , छपट रहा हूँ!
            कुछ जीने; ऐसे न मरने के लिए !"

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रविवार, 5 फ़रवरी 2012

शीर्षक - “ ज़िन्दगी  थम  सी  गयी  है “
दिनांक - १५.०४.2007

"ज़िन्दगी  थम  सी  गयी  है !
मन  के  पत्ते  हिलते  जाते  है,
आकांक्षाओं के फूल खिलते जाते है !!
तन  की  टहनी  भी  बढती  जाती  है,
फिर  भी  पेड़  वही  है !!
ऐसा लगता है जैसे;
ज़िन्दगी थम  सी  गयी  है !! "

" पीछे  से  जो  आवाज़  देते  थे,
आगे  दौड़ते  नज़र  आते  है !!
रो  रोकर  जो  भीख  मांगते  थे,
मुझ  पर ही  हंसते , इतराते  है !!
दुनिया  भागती  जा  रही  है,
मैं  वही  का  वही  हूँ  !!
लगता  है  की  जैसे  मेरी;
ज़िन्दगी  थम  सी  गयी है  !! "

" बचपन  के  सपनो  को  अब,
पूरा  करने  का  वक़्त  पास है !!
बाजू  में है ताक़त  और
दिल में एक प्यास  है !!
लोगो  को  मुझपे  भी,
पूरा विश्वास  है !!
फिर  भी  नहीं  मन  में 
अब  कोई  आस  है !!
लगता  है  जैसे  मेरी, 
ज़िन्दगी  थम  सी  गयी  है !! "

" गन्दी  कीचड  के  गरीब  भी  !
अब  मलमल  के  तकिये  लगाते  है !
ठंडी  साँसे  भरते  थे   जो !
गर्म  होठो  के  प्याले  लगाते  है !
प्याला  है  चारो  और  मेरे !
पर  छूने  का   मन  नहीं !
लगता  है  की  जैसे  मेरी !
ज़िन्दगी  थम  सी  गयी  है !! "

" या  वक़्त  ही  दौड़  रहा है ?
या  मेरी  ही  घड़ी  धीमी है ?
लोगो  की ही प्यास  बढ़ी  है ?
या मेरा  ही मन  संतोषी  है ?
या  सबकी  है  आँखे  खुली ?
या  मुझ पर ही  परते  चढ़ी  ?
क्या  करूँ  ऐसा  लगता  है  कि,
ज़िन्दगी ही थम  सी गयी  है !! "

" मेरा  भुलावा  है , या  मेरा  संतोष  है ?
आँखों  में  अब  भी  बस,
शांति  है; न  क्षोभ  है !
अगर है  छलावा, 
ज़िन्दगी  के बदल  जाने  में !
तो  खुश  हूँ  मैं ,
इस  ज़िन्दगी  के  थम  जाने  में
फिर  भी  क्यूँ  लगता  है  कि;
जैसे  ज़िन्दगी  थम  सी  गयी  है !! "

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

Mere man panchii

शीर्षक - मेरे मन  पंछी 
दिनांक - ०२.११.११ 

मेरे मन पंछी  
कहीं   और  तू  चल!
कोई  और  गगन
तू  होके  मगन!

          तप  सूर्य  से  दूर
          हिम  चन्द्र  से  दूर!
          इन  यादों  के  टिम  टिम  
          तारों  से  भी  दूर!

इस  जग  लोलुप  की  
पिपासा  से  दूर !
जो  पूर्ण  न  हो
उस  आशा  से  दूर !

         रिश्तों  नातों  के
         बंधन  से  भी  दूर !
         जो  शीत  न  दे
        उस  चन्दन  से  भी  दूर !

उस  चंचल  मृग - 
नयनो  से  भी  दूर !
उस  पाखंडी  
गहनों  से  भी  दूर !

         चल  मन  पंछी  
         उस  ओर  तू  चल !
         जहां  मन  की   चले
         सब  हो  उज्जवल !

एक  हाथ  उठे 
एक  साज़  बजे !
मन  हर्षित  हो
जज़्बात  जगे !

          ना  हो  कलुषित  मन  
          ना  कुरूप  बदन !
          ना  ही  वासना  ग्रसित
          स्त्री  लावण्य !

हो  उन्मुक्त  गगन
उन्मुक्त  चमन !
हर  फूल  खिले
आनंदित  तन !

          सब  अभिलाषा  हो
          वो  पूर्ण  जहा !
          मेरे  मन  पंछी
          उस  ओर  तू  चल !!!
          उस  ओर  तू  चल !!!

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

Sabase Mahan

शीर्षक  - सबसे महान
कविता का दिनांक - ०१.०२.२००३


"फिर आज स्मृति में उठती है,
नदियों की कलकल जलधारा  .
हीरे मोती सी सजती है,
पर उनकी स्मृति  धुंधली छाया."


          " है स्मृति में पूर्ण रूप से ही,
          वह अधनंगी दुर्बल काया.
          वह मुह बांधे बैठी ही थी,
          लेशमात्र न थी धन की माया."


" वह कृषक गात वैदेही थी,
आँचल में शिशु समेटी थी.
मुख था मलिन, थे केश खुले,
उनमे कालिख और रेती थी."

          " आँखों का सब जल सूखा था,
          पर स्वेद से आँचल भीगा था.
          थे भानु वहा पे उद्दंड खड़े,
          रेतों पर धूप प्रचंड पड़े."

" पेटों की अतनियाँ  सूखी थी,
लगता कई दिन की भूखी थी.
हाथो में बनी सुपाड़ी थी,
लगता शायद वो भिखारी थी."

           " पर ना थी कोई भिखारी वो,
           भाग्य की कोसी बेचारी वो.
           थी रुमाल मात्र ही साड़ी वो,
           लज्जा की परिभाषा हारी वो."


" बांहों में बच्चा रोता था,
हाथो में सिक्का खोटा  था.
शायद क्षुधा से ना सोता था,
रवि में तन को वो भिगोता था."

          " वे लोग गुजरते जाते थे,
           कोई ना भूख मिटाते थे.
           नैनो से घृणा दिखाते थे,
           अपने धन को वो बचाते थे."

" थे वही पे एक महान खड़े,
लगते सज्जन निर्मल थे बड़े.
पित्रभक्त, पिता का श्राध किये,
भजते थे केवल हरे हरे."

          " सौ पंडो को भोज कराते थे,
           उस पर पंखा वो हिलाते थे.
           उस प्रचंड धूप से बचाते थे,
           उस पर आभार दिखाते  थे."

" फिर उठ उनसे  मिष्ठान  लिए,
फिर दूधो का वो पान किये.
तत्पश्चात बहुत सा दान लिए,
फिर उसके बाद प्रस्थान किये."


          " पंडित थे मोटे  भैसे से,
            थे गाल टमाटर जैसे से.
            तरबूजो सी तोंद लिए,
            जटते सज्जन को पैसे से."


" यह सब देखा उस स्त्री ने,
यह सब देखा मेरी दृष्टि ने.
क्या होता इस धन वृष्टि में,
ऐसा होता इस सृष्टि में ?"


          " सहसा बालक कुछ मंद हुआ,
            उसका क्रंदन अब बंद हुआ.
           शायद उसका अब अंत हुआ,
           धरती पे कोई ना संत हुआ?"


" एक बाज़ उधर उड़ता आया,
बालक पर पंजा बढ़ता आया.
हाथो में बालक उठ आया,
फिर नोच नोच उसको खाया."


          " फिर लू का एक झोंका आकर,
            कौपीन मात्र वस्त्र उड़ाकर.
           बालू से कृशगात सजाकर,
           चला गया वही समाधि बनाकर."

" क्या सज्जन ही था वह प्राणी?
क्या निर्मल ही था वह पानी?
सबसे महान वह बालू थी,
जो बना समाधि; बन गयी दानी."
जो बना समाधि; बन गयी दानी."




सोमवार, 26 सितंबर 2011

Navoday

शीर्षक - नवोदय
दिनांक - २४.०७.२००७

"फिर आज सूर्य प्रचंड हुआ.
इक नव दिन आरम्भ हुआ.
कितने नवीन पुष्प खिले.
होठों पे मुस्कान खिले."

          "जीवन में उत्साह जगा.
          कर्णों में इक साज़ बजा.
          मंदिर में नवदीप जला.
          मधुर कोकिल संगीत बजा."

"नदियों में हुई छल छल छल.
लोगो में हुई चहल पहल.
सब निकले अपने कामों पे.
बच्चे स्कूल मैदानों में."

          "पर क्या मम गृह्दीप जला?
          दिल में नव संगीत बजा?
          चादर ओढ़े उकडा हूं
          नीरवता में सिकुड़ा हूं."

"दिल में है कोई आस नहीं.
होठों पर भी है प्यास नहीं.
नज़रे दर पे हैं टिकी हुई.
पर किसी का आभास नहीं."

          " कौन है जो दर पे आएगा.
          मुझ मृतपाय को जगायेगा.
          फिर आएगा कोई ठग प्राणी.
          बोलेगा धर्मों की वाणी.'

"ईश की बात बताएगा.
सुख का मार्ग दिखायेगा.
बोलेगा वह तो ज्ञानी है.
सब सुखों का स्वामी है."

          "तू भी आ चरणों में गिर.
          प्रभु की भक्ति में जा फिर.
          प्रभु क्या उसके चरणों में है?
          पीत वस्त्र आडम्बर में है?"

"प्रभु है सच्चे वचनों में.
निर्मल मन के कथनों में.
पर मन निर्मल हो पायेगा?
वह कौन जो राह दिखायेगा?"

          "आएगा वह सुन्दर प्राणी.
          मन में लिए सुमधुर वाणी.
          सब आडम्बर से दूर हुआ.
          मन निश्छल शीतल पूर्ण हुआ."

"वह होगा साधारण मानव.
न होगा पाखंडी दानव.
सुख का मार्ग दिखायेगा.
सब दुःख दूर भगाएगा."

          " है ह्रदय उसी की प्रतीक्षा में.
          मन प्यासा उसकी शिक्षा में.
          फिर मेरा भी सूर्य उदय होगा.
          नव जीवन नवोदय होगा."

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

Sookh Rahe Mere Pran

शीर्षक -  सूख रहे मेरे  प्राण 
दिनांक - ०३.०५.२००७

"आज फिर तेरी बांहों में सिमट जाने को जी चाहता है.
तेरी झील सी नीली आँखों में डूब जाने को जी चाहता है."

          " जी चाहता है बिन बोले ही सब कुछ कहता जाऊं .
          तुम बस सुनती जाओ और मैं सुनाता जाऊं ."

" तेरे मेरे बीच में कोई शुक्रिया कोई मेहरबानी ना रहे.
ना तुम हो उदास ना कोई परेशानी रहे."

          "खो जाओ मैं तेरी मूक बधिर आँखों में.
          मेरे कानो में कोई लब्ज़ कोई जबानी ना रहे."

"टूट जाए सारी कस्मों और रिश्तो के बंधन.
दिन रात तेरी बांहों में ये जिंदगानी रहे."

          " ना तुम कोई आस रखो, ना मैं कोई इच्छा.
          ना ही हमें चाहिए सहानुभूति की भिक्षा."

" तुम बनो मेरी प्रेरणास्रोत, मैं बनू तुम्हारा आदर्श.
ना हो कोई कलुषित इच्छा, ना ही मलिन स्पर्श."

         " तुम दीपशिखा की दीपिका, मैं रागभैरवी तान.
          तुम चंचल कोमल चितवन से मारो फूलो के बाण."

" तुम बनो पुष्प सुन्दर माला, मैं बनू वीणा का तार.
फैलाओ सुमधुर अमृत रस, मैं गाऊँ जीवन गान."

          "ऐ मेरी सपनो की देवी ! ऐ रति ! ऐ चंद्रकांत!
          एक मधुर मिलन की मेला में, अब सूख रहे मेरे प्राण.
                                                      अब सूख रहे मेरे प्राण."

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

Ye akelapan

शीर्षक -    ये अकेलापन
कविता का दिनांक - ३१.०३.०७

"आज फिर आ खड़ा,
द्वार पे आ पड़ा.
मेरे जीवन का साथी,
मेरा सूनापन ये अकेलापन. "

            "मछलियों की तरह,
            जग  बाज़ार में .
            यु ही बिकता रहा,
            मेरा सूनापन, ये अकेलापन."

"झील दरिया किनारे,
आँख जल में लगाये.
गहराता ही गया,
मेरा सूनापन, ये अकेलापन."

            बंद कमरे में जकड़ा,
            सर्द चादर में उकडा.
            सिकुड़ता ही  गया,
            मेरा सूनापन, ये अकेलापन."

“आस दिल में लगाये,
सांस साँसों में समाये.
सांसे  गिनता गया
मेरा सूनापन, ये अकेलापन”
  
            शब्द शब्दों से चुनके,
निशाब्दो को सुनते.
निशब्द ही बचा,
मेरा सूनापन ये अकेलापन”

“आँख जल से भरे ,
कभी  निर्जल  किये .
आँखों  आँखों  में जीता ,
मेरा सूनापन, ये अकेलापन.”

“हर  जन  की आवाज  में,
कर्ण  पल्लव  लगाये.
शोर  में शांति  खोजे ,
मेरा सूनापन, ये अकेलापन.”

“ईश  की भक्ति  में,
बाहु की शक्ति  में.
मन  की आसक्ति  ढूंढें ,
मेरा सूनापन, ये अकेलापन.”

“सुर  के संगीत  में,
प्रिय  आनंद  गीत  में.
आनंद  खोज करता ,
गया  सूनापन, ये अकेलापन.”

“वस्तु , धन  माया  में,
तन , विषय  काया  में.
शीत  छाया  ना पाया ,
मेरा सूनापन, ये अकेलापन.”

“मदिरा  की धार  में,
नारी  के  प्यार  में.
चलता  ही गया,
मेरा सूनापन, ये अकेलापन.”

“अब  समय  की ये टिक  टिक,
और  सांसो  की सरगम .
का  साथी बना  है,
मेरा सूनापन, ये अकेलापन.”

“फिर  भी  है  खोज  में,
उस  अरल  शब्द की.
उस अचल  सत्य की,
मेरा सूनापन, ये अकेलापन.”